हरदी बाजार, कोरबा (छत्तीसगढ़)।घनश्याम (गुड्डा) श्रीवास।आधुनिकता, बेहतर शिक्षा, सरकारी नौकरी और बेहतर भविष्य की चाह आज हर परिवार की प्राथमिकता बन चुकी है। माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए जीवनभर मेहनत करते हैं और चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे बेहतर जीवन जिएं। लेकिन जब यही बच्चे रोजगार और आधुनिक जीवनशैली की तलाश में माता-पिता से दूर चले जाते हैं, तब एक सवाल जरूर खड़ा होता है—इसे उन्नति कहें या रिश्तों का पतन?
यह सवाल किसी एक परिवार तक सीमित नहीं है। बदलते सामाजिक परिवेश की इसी सच्चाई को सामने लाती हैं छत्तीसगढ़ के शिक्षक परिवारों से जुड़ी दो घटनाएं।
पहली कहानी—बेटे इंजीनियर बने, लेकिन माता-पिता अकेले रह गएछत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्र में रहने वाले एक शिक्षक ने अपने दोनों बेटों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई। पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों बेटों ने अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी हासिल की। समय आने पर पिता ने दोनों बेटों की इच्छा के अनुसार सामाजिक रीति-रिवाज से उनका विवाह भी कराया।
नौकरी अलग-अलग राज्यों में होने के कारण दोनों बेटे विवाह के बाद अपनी-अपनी पत्नियों के साथ सेवा स्थल पर चले गए। इधर शिक्षक दंपती अपने घर में अकेले रह गए।
समय बीतता गया। दोनों बेटों के परिवार बढ़े, नाती-पोते भी हुए, लेकिन नौकरी और जिम्मेदारियों के कारण उनका माता-पिता के पास आना साल में एक-दो बार तक सीमित रह गया।
आज उम्र के उस पड़ाव पर जब माता-पिता को अपने बच्चों, बहुओं और नाती-पोतों के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब दूरी उन्हें भीतर से खलने लगी है। दूसरी कहानी—सरकारी शिक्षक बने बेटे, फिर भी माता-पिता अकेलेबिलासपुर संभाग के एक शिक्षक ने भी अपने दोनों बेटों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाया। दोनों बेटे पिता की प्रेरणा से सरकारी शिक्षक बने और अपनी-अपनी नौकरी के स्थान पर परिवार के साथ रहने लगे।
पिता अपने गांव के पास से ही सेवानिवृत्त होकर पत्नी के साथ गांव में रहने लगे। उम्र बढ़ने के साथ उन्हें भी अपने बेटों, बहुओं और नाती-पोतों की जरूरत महसूस होने लगी। लेकिन नौकरी और आधुनिक जीवनशैली के कारण बेटे अपने माता-पिता से दूर होते गए।
दुर्भाग्य से वह पिता अपने जीवन के अंतिम समय में दोनों बेटों का चेहरा तक नहीं देख पाए और उनका निधन हो गया।इसके बाद मां अकेली रह गईं। उनकी देखभाल को लेकर दोनों भाइयों के बीच मतभेद की स्थिति भी बनी। अंततः छोटे बेटे ने मां की जिम्मेदारी उठाई और उन्हें अपने कार्यस्थल पर अपने साथ ले गया।
जिस मां ने अपना पूरा जीवन गांव और अपने सामाजिक परिवेश में बिताया था, वह जीवन के अंतिम पड़ाव में बेटे के कार्यस्थल पर पहुंचकर एक तरह से अपने परिचित संसार से दूर हो गईं। कुछ समय बाद उनका भी निधन हो गया। सवाल सिर्फ दो परिवारों का नहीं, पूरे समाज का हैइन दोनों घटनाओं में किसी की शिक्षा, नौकरी या सफलता को गलत नहीं कहा जा सकता। बच्चों का अपने पैरों पर खड़ा होना और अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करना निश्चित रूप से उपलब्धि है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या आर्थिक और व्यावसायिक उन्नति के साथ माता-पिता के प्रति हमारी जिम्मेदारियां भी उतनी ही मजबूत रह रही हैं?क्या आधुनिक जीवनशैली हमें सुविधा तो दे रही है, लेकिन रिश्तों की गर्माहट हमसे छीन रही है ? क्या नौकरी, करियर और बेहतर जीवन की दौड़ में हम उन माता-पिता को अकेला छोड़ रहे हैं, जिन्होंने हमें आगे बढ़ाने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया?उन्नति या पतन—फैसला समाज करेआज संयुक्त परिवार तेजी से छोटे परिवारों में बदल रहे हैं। रोजगार और बेहतर अवसरों के लिए युवाओं का दूसरे शहरों और राज्यों में जाना स्वाभाविक है। लेकिन दूरी चाहे कितनी भी हो, माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी और भावनात्मक जुड़ाव खत्म नहीं होना चाहिए।
उन्नति केवल अच्छी नौकरी, बड़ा घर और अधिक आय का नाम नहीं है। असली उन्नति शायद तब है, जब आधुनिक सुविधाओं के साथ हम अपने रिश्तों, संस्कारों और बुजुर्ग माता-पिता का सम्मान भी कायम रखें। इन दोनों कहानियों के माध्यम से एक बड़ा सवाल समाज के सामने है—हम वास्तव में उन्नति कर रहे हैं या आधुनिक जीवनशैली की आड़ में अपने पारिवारिक मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं? इसका उत्तर और फैसला हम आप सभी के विवेक पर छोड़ते हैं।
Uday Kumar serves as the Editor of Nawa Chhattisgarh, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering local, regional, and national developments.

