भू विस्थापितों का दर्द आज किसी से छीपा नहीं रहा। और SECL कि देखा देखी अन्य कंपनियां भी आजकल उसी अंदाज में मूलनिवासीयों का शोषण करती नजर आ रही है। कोयला उत्खनन का टारगेट पूरा कर प्रमोशन पाने के चक्कर में कई अधिकारी अनैतिक रास्ते अपनाने लगे हैं। जिसमे भू-अधिग्रहण प्रक्रिया में खुलेआम भ्रष्टाचार शुरू हो चूका है। अब अधिग्रहण के नाम पर बंदूक कि नोंक पर जमीने लूटी जा रही हैं। जितने CISF जवान हैं उन्हें आज बॉर्डर पर कम माइनिंग इलाकों में ज्यादा तैनात किया गया है।

ASEA कि शान कहे जाने वाले नंबर वन कोयला खदान गेवरा दीपका भी आज बंदूक कि नोंक पर अधिग्रहण किए जाने में पीछे नहीं रहा। अब यहाँ भी बंदूक कि नोंक पर जमीने लुटकर कोयला उत्खनन किया जा रहा है। सांसद महोदया चुप्पी साधी बैठी हुई है। भू विस्थापितों के मुद्दे से वह पहले ही दुरी बना चुकी हैं।

जिले का सबसे बड़ा मुद्दा होने के बावजूद भी आजतक कोरबा जिला सांसद महोदया भू विस्थापितों का मुद्दा संसद भवन में नहीं उठा सकी, मगर उन पर चीखने चिल्लाने कि जगह लोग उन पर चीखने चिल्लाने लगते हैं जिन पर चीखने चिल्लाने से मुद्दे नहीं सुलझने वाले। आज जो कुछ बंदूक कि नोंक पर भू अधिग्रहण हो रहा है। वह प्रशासन कि सह में हो रहा है। और सांसद व विधायक का मौन रहना उनकी मौन सहमति भी दर्शाता है।

SECL अंतर्गत ठेका कंपनियों को SKILLED लोग चाहिए। फिर SECL ग्रामीणों की जमीनें अधिग्रहण करते वक़्त यह क्यों नहीं देखता की जिनकी जमीने अधिग्रहण की जा रही हैं वह लोग खदान का कार्य करने के लिए स्किल्ड है या नहीं। अधिग्रहण के समय तो SECL ठेका कंपनियों में नौकरी का प्रलोभन देकर भुमि अधिग्रहण करता है।

अधिग्रहण उपरांत जब भू-विस्थापित रोजगार के लिए SECL के दफ़्तरों में जाता है तो फॉर्मेलिटी निभाने के लिए SECL भू-विस्थापितों की लिस्ट ठेका कंपनियों को दे देता है यह कहकर की इनमे से कोई आये तो स्कील टेस्ट करके देखकर रख लेना, बस इतना करने उपरांत SECL वहाँ से अपनी जिम्मेदारी खत्म समझता है। अब जाहिर सी बात है की कोई भी ठेका कंपनियां नौकरी हेतु स्किल्ड व्यक्ति ही रखेंगी।

मगर जिस ग्रामीण की जमीन खदान विस्तार में कुर्बान हुई वह तो स्किल्ड नहीं, वह तो आम ग्रामीण है। अगर SECL को स्किल्ड व्यक्ति ही चाहिए थे तो स्किल्ड व्यक्ति की ही जमीन अधिग्रहण करना चाहिए था। मगर अधिग्रहण के वक़्त किसी तरह के स्कील की कोई डिमांड नहीं की जाती, क्योंकि ऐसे में तो unskilled व्यक्ति की जमीने अर्जन ही नहीं कर पाएंगे, अधिग्रहण के वक़्त SECL एक से बढ़कर एक प्रलोभन देता है क्योंकि SECL को केवल अपना उल्लू सीधा करना होता है। अपना असली चेहरा तो अधिग्रहण उपरांत दिखाता है जब ग्रामीण नौकरी के लिए SECL के दफ़्तरों के चक्कर काटता है।

अब यहीं पर शुरू होता है दलाली का खेल, ठेका कंपनियों को स्किल्ड मजदूर चाहिए जो उनके काम संभाल सकें, ग्रामीण जिनकी जमीने अधिग्रहित की गई उसमे से अधिकांश उस कार्य हेतु स्किल्ड नहीं जिस तरह का कार्य ठेका कंपनियों में करवाया जा रहा है। तो यहाँ पर SECL को अपनी जिम्मेदारी निभाते हुवे भू विस्थापितों का स्कील डेवलपमेन्ट का कार्य करना चाहिए। और इसके लिए SECL बकायदा फण्ड रेज भी करता है। मगर उस फण्ड का भी बंदर बाँट हो जाता है। जिस वज़ह से भू विस्थापितों का स्कील डेवलप नहीं हो पाता और उन्हें ठेका कंपनियों में स्कील टेस्ट के दौरान फ़ैल घोषित कर दिया जाता है।

📌 भू-विस्थापितों का स्कील डेवलपमेंट करना SECL कि जिम्मेदारी, बिना स्कील डेवलप मेन्ट किए ठेका कंपनियों में स्कील टेस्ट के नाम पर किया जा रहा फ़ैल।

अब जाहिर सी बात है बिना स्कील डेवलपमेंट के भला संसार का कौन सा प्राणी स्किल्ड बन सकता है। SECL के जितने स्टॉफ हैं उनका पहले स्कील डेवलपमेंट किया गया उन्हें ट्रेनिंग दिया गया तदुपरान्त कार्यभार सँभालने को दिया जाता है। मगर वही भू विस्थापितों के साथ SECL चीटिंग करता है। उनकी जमीने लेने उपरांत उनका स्कील डेवलपमेंट नहीं करता क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो मूलनिवासीयों का सचमुच में विकास हो जायेगा। जो बात पर्दे के पीछे छिपे शोषणकारी वर्ग को बर्दास्त से बाहर हो जाएगी।

इसलिए मूलनिवासियों का हक मारने के लिए और अपनी जेब भरने के लिए दलाल नेता यहाँ सक्रिय हो जाते हैं। और अन्य प्रांतों से स्किल्ड व्यक्ति मंगवाते हैं। बदले में उनसे मोटी रकम लेकर उन्हें ठेका कंपनियों में रोजगार दिलवाते हैं। फिर यहाँ शुरू करते हैं राजनीति फिर स्थानीय और बाहरी को लड़वाया जाता है। ताकि फिर से उसी सिट को किसी और को बेचकर मोटी रकम हजम की जा सके।

📌 अस्थाई काम के लिए SECL को घर जमीन देना समझदारी नहीं

आप देख सकते हैं की किस तरह सबसे पहले तो झूठ बोलकर भू मालिक की जमीन अधिग्रहण करके उसे भू विस्थापित बनाया जाता है। और यह सब ठेका कंपनियों में रोजगार प्रदान करने का प्रलोभन देकर भुमि अधिग्रहण किया जाता है। एक विशेष बात यह की ठेका कंपनियों का अस्तित्व भी सदा के लिए नहीं होता बल्कि महज 3 से 5 वर्षो का इनका टेंडर होता है फिर आगे वह रहेगा या नहीं यह भी नहीं पता। और 3 से 5 वर्षो पश्चात नौकरी बदलनी ही है इसलिए क्षणिक अस्थाई नौकरी के लालच में अपना घर अपनी जमीन देना समझदारी का काम नहीं है।

📌 Paps के तहत भू विस्थापितों हेतु 30% ठेका कार्य आरक्षित इसके बावजूद मूलनिवासी भू विस्थापितों को नहीं दिया जा रहा ठेका

यहाँ SECL का 80% काम ठेका कंपनियां संभाल रही हैं। 20% काम SECL में कार्यरत कर्मचारी संभाल रहे हैं। मतलब SECL का ऑलरेडी 80% प्राइवेटाईजेशन हो चूका है। नाम मात्र की यह अब सरकारी संस्था रह गई है। अब SECL का 80% काम प्राइवेट ठेका कंपनियां संभाल रही हैं। बड़े बड़े ठेके तो दिल्ली से ही तय हो जाते हैं।

यहाँ अधिकांश कम्पनियां किसी ना किसी नेता मंत्री की ही हैं। और तो और छोटे मोटे जो ठेके निकलते हैं उन पर भी बाहरी रसूखदार लोगों का कब्जा है। भू विस्थापितों के लिए कहने को 30% ठेका PAPS के तहत आरक्षित है। मगर आज की तारीख में उसे भी रसूखदार लोगों द्वारा हथिया लिया गया है। मलाई सब बाहरी लोग खा रहे हैं और मूलनिवासी अपना जल जंगल जमीन लुटाकर डस्ट खा रहा है नौकरी तक नहीं मिल रहा, उनके हिस्से के ठेके भी बाहरी लोग खा रहे हैं।

📌 SECL अंतर्गत ठेका कंपनियों में रोजगार का गेट SECL द्वारा गठित कमेटी

दलाल नेता लोग Secl के कमेटी मेंबर बनकर बाहरी लोगों से पैसे लेकर उन्हें secl के ठेका कंपनीयों में रोजगार दिलवाते हैं। जिस रोजगार पर पहली प्राथमिकता स्थानीय मूलनिवासीयों का है उसकी दलाली करके नेता लोग वह अधिकार चुराकर बाहरी लोगों के हांथो बेच देते हैं। इस विषय पर मूलनिवासी समाज को जागरूक होने की जरूरत है और secl के कमेटी के मेंबर बने नेताओं की हरकतों पर निगरानी रखने की जरूरत है। साथ ही secl पर दबाव बनाने की शख्त जरूरत है की वह मूलनिवासी भू विस्थापितों की जमीने लेने उपरांत उन्हें योग्य बनाये खदानों में ठेका कंपनियों में कार्य करने के योग्य बनायें skilled बनाये और जरूरत है इस चीज का दबाव बनाने कि कि secl बिना स्कील डेवलपमेंट के किसी भी भू विस्थापित को ठेका कंपनियों में रोजगार के लिए ना भेजे।

📌 धारा 9 (1) प्रकाशन में फर्जीवाड़ा

भू विस्थापितों का रोजगार छीनने के लिए SECL एक पैतरा और अपनाता है। SECL क्या करता है कि वह आजकल जिस किसी गांव का अधिग्रहण कर रहा है उस गांव के सरपंच को या तो खरीद ले रहा है या उसकी कमजोरी पकडकर शांत करवा दे रहा है फिर गांव में धारा 9 का प्रकाशन करवा दे रहा है। जिसके उपरांत गांव में जमीन से संबंधित कार्यों पर रोक लगाई जा रही है. मतलब धारा 9 (1) के प्रकाशन उपरांत गांव में निर्माण कार्य नहीं करवाया जा सकता। यहाँ तक कि धारा 9 प्रकाशन उपरांत जमीन का टुकड़ो में नहीं बांटा जा सकता। मतलब भाई भाई का बंटवारा नहीं होगा मतलब एक बड़े भूखंड का अधिग्रहण होगा और केवल एक ही नौकरी सृजीत होगा और घर पर अन्य भाइयों में फिर झगड़ा शुरू होगा और वह एक नौकरी भी उस झगड़े में विवादों में फंस जायेगा।

इस तरह कि कुटरचना SECL करवाता है। जिसे लेकर मूलनिवासी समाज को जागरूक होने कि शख्त जरूरत है। आजकल तो गांव में बिना जन सुनवाई के धारा 9 (1) प्रकाशन हो जा रहा है। फिर गांव का सरपंच ग्रामीणों को लेकर विरोध प्रदर्शन करने बाहर निकल रहे हैं। जब कि उससे पहले धारा 8 धारा 7 प्रकाशन होता है जिसकी सुचना सरपंच के पास जाती है। मगर तब वह चुप्पी साधे रहता है और प्लानिंग अनुसार धारा 9 प्रकाशन उपरांत ही गांव का सरपंच हल्ला करना शुरू करता है।

क्योंकि धारा 9 प्रकाशन उपरांत भुमि सरकार कि हो चुकी अब उक्त भुमि पर किसी तरह का कोई निर्माण कार्य नहीं करवाया जा सकता ना भाई भाई का बंटवारा होगा। इस तरह से देखने में यह भी आ रहा है कि सरपंच या तो अपनी जेब भरने के लिए SECL के साथ मिलकर कुटरचना में उसका साथ दे रहा है या राजनैतिक दबाव में सरपंच को SECL का साथ देना पड़ रहा है या सरपंच कि कमजोरी पकडकर उससे SECL ले फेवर में काम करवाया जा रहा है। मलगांव केस में केवल एक ग्रामीण को SECL कि नौकरी मिली उसके अलावा किसी को SECL कि नौकरी नहीं मिली सोचिये जरा किस स्तर कि कूटरचना कि गई थी कि महज एक नौकरी सृजित हुई होगी
Uday Kumar serves as the Editor of Nawa Chhattisgarh, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering local, regional, and national developments.

