अक्सर भू-विस्थापितो की यह शिकायत रहती है की उनकी जमीने अधिग्रहण करने उपरांत भी SECL उन्हें ठेका कंपनियों में प्राथमिकता नहीं दे रहा और आउटसोर्सिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। और रोजगार के लिए अनेकों तरह से SECL के खिलाफ या उसकी ठेका कंपनियों के खिलाफ आंदोलन लगातार होते ही रहते हैं। आखिरकार क्या वज़ह है जो SECL मूलनिवासीयों को छोड़कर बाहरी लोगों को प्राथमिकता देता है।
इस बात की गहराई में जब जायेंगे तो यह जानकारी मिलती है की मूलनिवासी ऑलरेडी अपना घर अपनी जमीन खदान विस्तार में देश हित में कुर्बान कर चूका। अब उसे रोजगार प्राप्त करने के लिए किसी को रिश्वत देने की क्या दरकार है। वहीं ठेका कंपनियों में एंट्री के लिए एक बैक गेट बना हुआ है। और वह गेट है SECL द्वारा गठित कमेटी जो यह निर्णय करती है की किसे ठेका कंपनियों में रोजगार मिलेगा किसे नहीं। और आपको जानकार हैरानी होगी की उक्त कमेटी के मेंबर स्थानीय जन-प्रतिनिधि हैं। जो बाहरी लोगों से नौकरी के बदले पैसे लेकर उन्हें ठेका कंपनियों में रोजगार के लिए अवसर प्रदान करते हैं। मूलनिवासी भू विस्थापित जिसकी जमीने SECL में जाती हैं।
उन्हें यह प्रलोभन तो दिया जाता है। की उन्हें ठेका कंपनियों में रोजगार दिया जायेगा। मगर भुमि अधिग्रहण उपरांत भू विस्थापित दर बदर की ठोकरें खाते रहते हैं मगर उन्हें ठेका कंपनियों में रोजगार नहीं दिए जाते। क्योंकि वह बैक गेट से एंट्री नहीं लेते वह नेताओं को पैसे नहीं देते और देंगे भी क्यों उन्होंने ऑलरेडी अपना घर अपनी जमीन लाखो की संपत्ति कुर्बान किए हैं। अगर 50,000 देकर ही नौकरी पाने का रास्ता उन्हें पहले बतलाया गया होता तो वह अपना घर अपनी जमीन SECL को नहीं दिए होते वह भी महज 50,000 रुपया दलाल नेताओं को देकर बैक गेट से एंट्री ले लेते। मगर देखा जाये तो सचमुच मूलनिवासियों के साथ गलत तो हो रहा है।
उनकी जमीन घर सब लेने उपरांत उन्हें ठेका कंपनियों में रोजगार नहीं दिया जा रहा। जो ज्यादा कोशिश करता है। उन्हें स्कील टेस्ट करके फ़ैल घोषित कर दिया जाता है। अब जाहिर सी बात है की जो ग्रामीण इससे पहले कभी कोयला खदानों में बड़ी-बड़ी मशीन डोजर डम्पर ट्रेलर इत्यादि नहीं चलाया वह स्कील टेस्ट में कैसे पास होगा। स्कील टेस्ट में फ़ैल करके उन्हें रवाना कर दिया जाता है। अब सवाल यह उठता है की जब बंदा स्किल्ड नहीं था तो उसकी जमीन यह कहकर अधिग्रहित नहीं करनी थी की बदले में ठेका कंपनियों में रोजगार देंगे।
अगर उन्हें पहले यह कहा गया होता की आप स्किल्ड नहीं तो वह अपनी जमीन नहीं देता SECL को मगर SECL भी कम चालाक नहीं है। इसलिए वह पहले भुमि अधिग्रहण करता है और अधिग्रहण के वक़्त एक से बढ़कर एक वायदे एक से बढ़कर एक कमिटमेंट करता है। और अधिग्रहण उपरांत ग्रामीणों को ठग देता है। रोजगार में मामले में भी SECL इसी तरह से मूलनिवासीयों को ठगता रहता है।
अब सवाल यह उठता है की SECL की ठेका कंपनियों में रोजगार कैसे प्राप्त करें तो इसके लिए मूलनिवासीयों के हित को लेकर संघर्ष करने वाले लीडर को भी SECL के कमेटी का मेंबर बनाना होगा तब वह जरूरत मंद बेरोजगार भू विस्थापितों को ठेका कंपनियों में एंट्री करवा पायेगा। और तो और लोगों को इस विषय पर जागरूक करना पड़ेगा की उनके द्वारा चुनें गए जन प्रतिनिधि ही उन्हें ठग रहे हैं. जो उनका हक अधिकार मारकर बाहरी लोगों से पैसा खाकर उन्हें ठेका कंपनियों में रोजगार दिलवा रहे हैं। अपने द्वारा चुनें गए जन प्रतिनिधियों के घर के सामने धरना देने की जरूरत है।
कमजोरी यही पर हो जाती है की हम सब कुछ जानते हुवे चुप रह जाते हैं।
कमजोरी यही पर हो जाती है की हम सब कुछ जानते हुवे चुप रह जाते हैं। एक और मुख्य बात ठेका कंपनियों में आज कल उन गांव के लोगों को नौकरी दी जा रही है जिस गांव को अधिग्रहण करना है। फिर अधिग्रहण करने के दौरान उस व्यक्ति को ही गांव के खिलाफ षड़यंत्र रचने के लिए मजबूर किया जा रहा है। ऐसे बहुत से मामले देखने में आ रहे हैं की SECL को जिस गांव का अर्जन करना है उस गांव के नौजवानों को उस ठेका कंपनियों में रोजगार दिया जा रहा है। जिस ठेका कंपनी को उक्त गांव में उत्खनन का कार्य मिला हुआ है। फिर उसे ब्लेकमेल करके गांव के खिलाफ साजिस रचने को मजबूर किया जा रहा है।
जिन चोरो पर ऊँगली उठानी चाहिए उनको छोड़कर हम समाज से लड़ने लग जाते हैं. हम बाहरी लोग से लड़ने लग जाते हैं। इससे उल्टा हम क़ानून के सिकंजे में कस जाते हैं और हमें जेल की हवा खानी पड़ती है। अगर चीखना चिल्लाना ही है तो अपने द्वारा चुनें गए जन प्रतिनिधि पर चीखो चिल्लाओ जो हम मूलनिवासीयों का हक मारकर किसी और से पैसा खाकर हमारे हक का रोजगार उन्हें सौम्प रहा है। जब तक रियल में जो चोर है उसे चोर कहना शुरू नहीं करेंगे तब तक धांधली रुकने नहीं वाली। अगर मुद्दे को सुलझाना है तो ठेका कंपनियों में एंट्री के लिए SECL में जो एंट्री गेट बनाया है मतलब जो कमेटी बनाये हैं उसे टारगेट करके उसके मेंबर को उसकी जिम्मेदारीयों का अहसास दिलाना पड़ेगा।
रही बात भू विस्थापितों के स्कील डेवलोपमेन्ट की तो यह जिम्मेदारी भी SECL की है। जो भुमि अधिग्रहण करने के दौरान अगर ठेका कंपनियों में रोजगार देने का वायदा कर रहा है। तो उसे भू-विस्थापितों को ट्रेंड करना होगा स्किल्ड बनाना होगा जिससे की वह ठेका कंपनियों में काम कर सकें, बिना स्कील डेवलप मेन्ट किए किसी व्यक्ति को ठेका कंपनियों में स्कील टेस्ट के लिए भेजना यह तो SECL की 420 है। जिस बात को लेकर SECL पर चार सौ बीसी का मुकदमा चलना चाहिए।
Uday Kumar serves as the Editor of Nawa Chhattisgarh, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering local, regional, and national developments.

