10/10/2025 को ग्राम हरदी बाजार में मलगांव वासियों नें SECL को जो पत्र दिया था 2 महीने उपरांत उसका जवाब आया है। पत्र में जोबातें लिखी गई हैं वह दुनियां के नंबर वन घोटाले बाज कंपनी के रूप में SECL को खड़ा करती हैं।
पत्र में कंडीका 1 में जिक्र किया गया है की समस्त ग्रामीणों द्वारा बसाहट के बदले मुआवजा राशि लेने की सहमति दी गई थी। जिसके आधार पर सभी पात्र ग्रामीणों को बसाहट के एवज में मुआवजा दिया जा रहा है। पात्र आवेदकों द्वारा आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन दिए जाने पर बसाहट की राशि प्रदान की जाएगी।
मगर इस बात का जिक्र नहीं किया गया है की प्रत्येक ग्रामीणों को 15 लाख रूपये मुआवजा राशि दिए जाने का वायदा किया गया था। और उससे पहले ऐसे ऐसे स्थानों पर बसाहट हेतु भुमि दिखाई गई थी जिसे कोई भी इंसान नकार दे और ग्राम वासी क्या नकारते SECL से मिला हुआ ग्रामीण खुद बसाहट हेतु स्थान दिखाने जाता और खुद ही रिजेक्ट कर देता। और कोई दिखाया गया प्लाट पसंद कर लेता तो उसे ग्राम प्रधान द्वारा कहा जाता की तुम क्या अकेले निर्णय करोगे। जो ग्राम प्रधान निर्णय करेंगे वही सही होगा। ऐसा कहकर मुंह खोलने वाले का मुंह बंद करवा दिया जाता था।
इधर ग्राम प्रधान secl से हाँथ मिलाकर बैठे हुवे था। और सारा दांव पेंच फिक्स किया जा रहा था। जब secl द्वारा दिखाए गए सारे जमीन को खुद ही ग्राम प्रधान लोग रिजेक्ट करते और फिर अंत में कहा गया की एक काम करते हैं बसाहट के बदले पैसा ले लेते हैं SECL से ऑफर आया है की बसाहट के बदले 15 – 15 लाख दिए जायेंगे। और गांव की बेटियों को बसाहट देने का वायदा किया गया था। मतलब अब उसे भी 15 – 15 लाख दिए जायेंगे।
बस इसी 15 लाख के झांसे में आकर ग्रामीण अपनी जमीन देने को राजी हो गए। मगर 15 लाख किस कंडीशन में दिए जायेंगे यह स्पष्ट नहीं बतलाया गया। SECL की R&R पॉलिसी के अनुसार 10+5 = 15 लाख तब दिए जाते हैं जब पूरा गांव एक साथ गांव खाली करें वह भी नामी जमीन वालों को सरकारी जमीन वालों को नहीं। मगर यहाँ मलगांव वासियों को यह कहा गया की जमीन नामी हो या सरकारी सबको 15 – 15 लाख दिए जायेंगे। तब ग्रामीन जमीन देने को राजी हो गए।
Secl की R&R पॉलिसी के मुताबिक 10 लाख नामी जमीन वालों को और 5 लाख सरकारी जमीन वालों को दिए जाते हैं। जब की कोल् बियरिंग एक्ट 1957 के तहत जमीन के एवज में मीलने वाली मुआवजा राशि बहुत ज्यादा अमाउंट में मिलेगी। मगर चुंकि ग्रामीणों को कोल् बियरिंग एक्ट 1957 और SECL की R&R पॉलिसी में अंतर नहीं मालूम इसलिए उन्हें बस यह कहा जाता है की नियम यह कहता है नियम वह कहता है।
मगर कभी स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा जाता की SECL द्वारा निर्मित R&R पॉलिसी का नियम या भारतीय संविधान के कोल् बियरिंग एक्ट 1957 का नियम। Secl की R&R पॉलिसी को मानने हेतु भू-विस्थापित बाध्य नहीं यह जबरन का थोपा जाने वाला अमानवीय असंवैधानिक नियम है। जो मानव के मूलभुत संवैधानिक अधिकारों का हनन करता हुआ एक तरफा SECL प्रबंधन को लाभ पहुंचाता है।
उसी तरह पत्र में कंडीका 2 में लिखा हुआ है की मकान की मुआवजा राशि राज्य शासन द्वारा गठित टीम द्वारा नापी उपरांत नियमानुसार बनाया गया है। आवेदक द्वारा आवेदन देने पर उनके स्वयं से संबंधित जानकारी कार्यालय समय में ली जा सकती है।
जबकि SDM कटघोरा का एक बयान आया था समाचार में जिसमे वह मलगांव में 152 काल्पनिक मकान की पुष्ठी किए। अब सवाल यह उठता है की बिना मकानों के महज कागजो पर मकान दर्शाया किस अधिकारी नें तो जाहिर से बात है की राज्य शासन की टीम गठित की गई थी जिसमे SECL के संबंधित विभागों के अधिकारीयों की टीम भी थी जिन्होंने मिलकर नापी जोखि की रिकॉर्ड तैयार किए तो जो रिकॉर्ड तैयार किए उसमे ही तो 152 काल्पनिक मकान पाए गए इसका सीधा सा तात्पर्य यह भी निकलता है की गठित टीम भ्रष्ट थी।
भले ही उसकी जाँच प्रशासनिक तंत्र जाँच तंत्र नहीं कर रहा यह अलग बात है मगर वास्तविकता तो यही है की भ्रष्टाचार उस टीम के द्वारा किया गया तब ही फर्जी रिकॉर्ड तैयार हुवे थे. अब यहां कंडीका 2 में साफ साफ उन्ही टीम का हवाला देकर लिखा गया है की राज्य शासन की टीम जब की उस टीम में SECL के अधिकारी भी थे। आगे कंडीका 2 में कहा गया है की *मकान की मुआवजा राशि राज्य सरकार द्वारा गठित टीम द्वारा नापी उपरांत नियमानुसार बना है।* जब की मलगांव वासियों को मकान का मुआवजा 2021 के रेट अनुसार मिला है जब की ध्वस्तीकरण 2025 में हुआ और अब तक मुआवजा नहीं आया जब की नियम यह कहता है जो भी नया रेट लिस्ट आता है उसके मुताबिक संसोधन करके अपडेट करके नए रेट लिस्ट अनुसार मुआवजा राशि देना पड़ेगा।
मगर यहाँ मलगांव वासियों को 2012 के रेट लिस्ट अनुसार मकान का मुआवजा मिला और जितना बना उसमे भी मनमाने तरिके से कटौती की गई है। आगे SECL प्रबंधन कंडिका 2 में ही कहता है कि आवेदक द्वारा आवेदन देने पर उनके स्वयं से संबंधित जानकारी कार्यालय समय में ली जा सकती है। क्योंकि एसडीएम महोदय का ही बयान है कि मालगांव में 152 काल्पनिक मकान पाए गए तो अगर कोई सामाजिक कार्यकर्ता उसे 152 काल्पनिक मकान की लिस्ट मांगता है जो भ्रष्टाचार का सबूत है।
तो उसे तो देना चाहिए। मगर यहां कहां जा रहा है कि आवेदक द्वारा आवेदन देने पर उनके स्वयं से संबंधित जानकारी कार्यालय समय में ली जा सकती है इसका दूसरे शब्दों में अर्थ यह भी है कि दूसरे किसी को जानकारी नहीं दी जाएगी और ऐसा हुआ भी है सूचना के अधिकार के तहत जब जानकारी मांगी गई तो भ्रष्टाचार से संबंधित जानकारियां नहीं दी जा रही है बहुत बड़े घोटाले की ओर इशारा करती है।
SECL से मलगांव वासियों को प्राप्त के कंडीका 3 में लिखा हुआ है कि ‘मुआवजा का भुगतान नियमानुसार किया जा रहा है।” मगर यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि वह नियम कौन से नियम है जिसके अनुसार मुआवजा राशि का भुगतान किया जा रहा है। क्योंकि एस.ई.सी.एल. अपनी आर एंड आर पॉलिसी के अनुसार भुगतान करता है। जबकि लोगों को कोल बेरिंग एक्ट 1957 के तहत मुआवजा का भुगतान किया जाना चाहिए।
अब ग्रामीण जो है वह SECL की आई.एन्ड.आर. पॉलिसी क्या है और भारतीय संविधान का कोल बेयरिंग एक्ट 1957 के नियम क्या है इसके बीच भेद नहीं जानते। जिसका फायदा उठाते हुए एस.ई.सी.एल. के अधिकारीगण ग्रामीणों को बेवकूफ बनाते हुए एस.ई.सी.एल. की आर. एन्ड.आर. पॉलिसी को ही इस कदर प्रस्तुत करते हैं जैसे कि वह ही भारतीय संविधान है। SECL कभी भी स्पष्ट शब्दों में लिखित में यह नहीं कहता कि एस.ई.सी.एल. की आर.एन्ड.आर. पॉलिसी के नियमानुसार मुआवजा का भुगतान किया गया।
वह बस यह कहता है कि *नियमानुसार* मुआवजा का भुगतान किया गया है। जिससे कि असमंजस की स्थिति बनी रहे लेकिन जब आप कोर्ट में जाएंगे तो आपको SECL की आर.एन्ड.आर. पॉलिसी के अनुसार नहीं बल्कि भारतीय संविधान के कोल बेयरिंग एक्ट 1957 के नियमानुसार मुआवजा राशि प्राप्त होता है।
कंडिका 4 मैं यह लिखा गया है कि “वैकल्पिक रोजगार हेतु दीपिका क्षेत्र में एक कमेटी गठित की गई है जिसमें बेरोजगार ग्रामीणों द्वारा आवेदन देने के उपरांत उपलब्ध पद के अनुसार रोजगार प्रदान किया जाता है।”
अब सवाल यह उठता है की उक्त कमेटी में कौन है तो जवाब है भाजपा कांग्रेस के नेता जो पैसे लेकर बाहरी लोगों को डायरेक्ट नौकरी पर रखवा देते हैं। इधर भू विस्थापित जिन्होंने अपना मकान अपनी जमीन देश हित में secl प्रबंधन को दिया जिनसे यह वायदा किया गया था की वैकल्पिक रोजगार के लिए secl की ठेका कंपनियों में जगह दी जाएगी वह जगह तो बाहरी लोग ले गए डायरेक्ट नेताओं के मुंह में पैसे ढूंसकर।
और मूलनिवासी भू विस्थापितों को जमीन घर लेने उपरांत बिना किसी प्रकार का प्रशिक्षण दिए। डायरेक्ट ठेका कंपनियों में इंटरव्यू के लिए भेजा जा रहा है। अब बिना skill development के बड़ी बड़ी मशीने ग्रामीण कैसे चलाकर दिखायेगा। इसलिए स्कील टेस्ट के नाम पर उन्हें फ़ैल करके दफा कर दिया जाता है। बाहरी लोट जो स्किल्ड होते हैं वह सीधे नेताओं को पैसे देकर ठेका कंपनी में घुस जाते हैं। और ग्रामीण जिन्होने देश के विकास के लिए अपना घर जमीन न्योछावर कर दिया उसे बिना स्कील डेवलप मेन्ट के स्कील टेस्ट करके फ़ैल घोषित करके दफा लड़ देते हैं।
यह सरासर अन्याय है। जो भू विस्थापित हैं उन्हें रिश्वत देने की दरकार ही नहीं क्योंकि वह अपना सब कुछ लुटा चूका जिसे यह झूठा वायदा मिला था की बदले में ठेका कंपनियों में रोजगार मिलेगा। प्राइवेट कंपनियों में रोजगार पाने के लिए अपना घर अपनी जमीन देना उचित नहीं इससे तो बेहतर विकल्प यह है स्कील डेवलप करके किसी भी कंपनी में स्कील टेस्ट देकर नौकरी पाई जाये। कम से कम घर व जमीन तो सुरक्षित रहेगा। और अगर घर जमीन दे रहे हैं तो लिखित आश्वासन उपरांत ही वहाँ से उठें क्योंकि बुलडोजरिंग उपरांत आप secl के ऑफिस के चक्कर काटते रह जायेंगे जैसे ऑलरेडी 40 वर्षों से लोग चक्कर काट रहे हैं।
Uday Kumar serves as the Editor of Nawa Chhattisgarh, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering local, regional, and national developments.

