मूलनिवासी संघ के बैनर तले SECL से प्रभावित भू विस्थापितों नें सोमवार को मीटिंग आयोजित कर हस्ताक्षर अभियान चलाया जिसमे SECL से प्रभावित भू विस्थापितों नें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, राज्यपाल छत्तीसगढ़, अध्यक्ष सह प्रबंधक निर्देशक SECL बिलासपुर को लिखें जा रहे पत्र में अपना अपना हस्ताक्षर किए और पत्रों को संबंधित विभागों में भेजा गया।

कहने को तो कहा जाता है की कलम बड़ी या तलवार तब सब कहते हैं की कलम बड़ी। मगर जब इंसान विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजर रहा होता है। खासकर ऐसी परिस्थितियाँ जब SECL जैसी कोयला कंपनी आपका संवैधानिक अधिकार छीनकर बैठी हुई हो। तब धीरज के साथ कलम के सहारे जितना बड़ा मुश्किल लगता है। और ऐसे वक़्त पर लोगों को कलम की जगह तलवार याद आने लगता है। मगर मूलनिवासी संघ कलम की ताकत क्या होती है।

इसका अहसास समाज को कराने निकला है। लोगों को अगर संवैधानिक अधिकार पाने हैं तो मूलनिवासी संघ लोगों को संवैधानिक तरिके से युद्ध लड़ने को प्रेरित करता है। भारतीय संविधान नें हमें अपना हक अधिकार प्राप्त करने के लिए अनेकों रास्ते दे रखें हैं। हम एक एक करके जरूरत अनुसार उन रास्तों को अपनातकर अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं।

भू विस्थापितों को मूलनिवासी संघ निरंतर उनके हक अधिकार से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को लेकर जागरूक करता रहता है। जिन गाँवों को अधिग्रहण करने के लिए SECL नें तरह तरह के पैंतरें अपनाकर लोगों में फुट डाल दिए थे। जिससे गांव की एकता टूटने से उन पर हमला कर उनकी जमीने छीन ली गई थी। आज मूलनिवासी संघ उन मूलंवासियों को एक एक करके पुनः मूलनिवासी संघ के बैनर तले जोड़ रहा है।

किसी भी संग्राम को जितने के लिए संगठित होना एकुजुट होना एकमत होना बेहद जरुरी होता है। हमारे बिच जो दुश्मनो नें फुट डाली थी। अब उसे खत्म कर एकजुट हो रहे हैं। अब वही मूलनिवासी समाज पुनः एक दूसरे के साथ सुख दुख बाँटने लगे हैं। जिस गांव को ध्वस्त कर बिखेर दिया गया था यह सोचकर की गांव पर बुलडोजरिंग करने से गांव की आत्मा मर जाएगी। तो दुश्मन की चाल यहाँ साफ साफ नाकामयाब होती नजर आ रही है।

पूर्व के कलेक्टर अजित बसंत नें SECL को एक तरफा लाभ पहुंचाने के लिए अपने विडो पॉवर का दुरूपयोग करते हुवे भले ही गांव को विलोपित कर दिया हो मगर गांव की आत्मा को वह नहीं मार सकें। जिस तरह कहा भी जाता है। की आत्मा अमर होती है। यहाँ उसका साक्षात् उदाहरण देख सकते है। की गांव को भले विलोपित कर कागजो में मार दिया गया हो जमीने खदान में चली गई हों घर खत्म हों गए हों मगर इसके बावजूद हिम्मत करके पुनः मूलनिवासियों का एकजुट होना यह प्रकृति की कुदरत की शक्ति को दर्शाता है।

की अब कुदरत खुद SECL के अति का अंत करने के लिए चाल चलने लगी है। और प्रकृति निमित्त लोगों के आंतरिक प्रकृति (नेचर ) में बदलाव कर उन्हें एकजुट कर सामना करके स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने के लिए प्रेरित कर रही है। शायद इसे ही उलगुलान कहा जाता है। इसे ही क्रांति कहा जाता है। क्रांति की आग धीरे धीरे फैलती हुई नजर आ रही है। एक से दो, दो से तीन और तीन से तीस और तीस से तीन सौ होते अब देर नहीं लग रहा। जिस किसी को यह अहसास हो रहा है की स्वाभिमान के लिए लड़ना बेहद जरुरी होता है।

वह स्वतः ही मूलनिवासी संघ के बैनर तले जुड़कर अपनी आवाज बुलंद करने लग रहा है। ऐसा महसूस हो रहा है मानो आवाज तो सब उठाना चाहते थे बस एक प्लेटफॉर्म की जरूरत थी और वह प्लेटफॉर्म बनी मूलनिवासी संघ जिसके बैनर तले सब एकजुट होकर आवाज बुलंद करने लग गए। अब जब उलगुलान शुरू हो चूका तो अब यह थमने वाला नहीं है। जिस तरह आग को हाँथ से बुझायेंगे तो हाँथ जल जाता है। ठीक उसी तरह क्रांति की इस आग को जो कोई बुझाने का दबाने का प्रयत्न करेगा क्रांति की लपटों में उसका हाँथ जल जायेगा।

भारतीय संविधान अगर तलवार है तो ढाल भी है। जरुरत अनुसार भारतीय संविधान का उपयोग हमें कभी तलवार तो कभी ढाल के रूप में करते रहना चाहिए। आज मूलनिवासी भू विस्थापितों को समय के संदर्भ में भी जागरूक किया गया। लोगों को यह बतलाया गया की अगर हमें युद्ध जितना है तो समय की इज्जत करनी होगी। अगर हम लेट लतीफ वाला रवईया अपनाएंगे तो समय हमारी कभी भी क़द्र नहीं करेगा। जितना हम समय की क़द्र करेंगे समय हमारी क़द्र करेगा।
Uday Kumar serves as the Editor of Nawa Chhattisgarh, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering local, regional, and national developments.

