मूलनिवासी संघ के पदाधिकारीयों नें कोरबा जिला कलेक्टर महोदय को ज्ञापन सौम्पा है जिसमे यह कहा गया है की बाल्को क्षेत्र में विगत तकरीबन 40 वर्षों से भी अधिक समय से गुमटीयां संचालित हैं जिनके संचालको को बाल्को प्रबंधन नें उक्त जगह को खाली करने का नोटिस दिया है। विचारणीय सवाल है की 40 वर्षों से किसी स्थान पर काबिज व्यक्ति के अपने संवैधानिक व मानवता से संबंधित मौलिक अधिकार भी होते हैं। और 40 वर्षों उपरांत इस तरह से किसी को बेदखल करना सीधे तौर पर उनके संवैधानिक व मानवाधिकार का हनन की श्रेणी में आता है।

मूलनिवासी संघ नें इसे देखते हुवे ही उक्त मामले में प्रशासनिक दखल करने की गुजारिश जोलाधिश से की है। मूलनिवासी संघ नें आगे कहा है की बाल्को प्रबंधन नें सरकार से लीज पर जमीन ली थी जिसका डेट एक्सपायर हो चूका है। अगर लीज का नवीनीकरण किया गया है तो उसके पेपर सार्वजनिक करने चाहिए। बाल्को प्रबंधन नें गुमटी संचालको को पहली मर्तबा जो नोटिस जारी किया है उसमे किसी तरह का कोई खसरा क्रमांक नहीं लिखा गया था। मगर दूसरे नोटिस में बकायदा खसरा क्रमांक लिखा गया है। जो मामले को और भी ज्यादा संदेहास्पद बनाता है।


जिस हेतु यह प्रशासनिक जाँच का विषय है की उक्त खसरा क्रमांक उसी भुमि का है या बालको प्रबंधन द्वारा गुमटी संचालको के मन में डर पैदा करने के लिए कहीं और के खसरा क्रमांक का हवाला देकर अपनी भुमि बतलाकर बेदखली का नोटिस जारी किया गया है। मूलनिवासी संघ नें सवाल उठाया है की अगर बालको प्रबंधन सही है और वह भुमि अगर बालको प्रबंधन की है तो वह प्रशासन को बिच में क्यों नहीं ले रहा, इसके बजाये बालको प्रबंधन खुद प्रशासन बनकर क्यों बेदखली का नोटिस जारी किए पड़ा है।


सवाल यह भी उठता है की बेदखली की नोटिस वह भी 40 वर्षों उपरांत मतलब 40 वर्षों तक क्या मौन सहमति थी। क्या बालको प्रबंधन को अचानक 40 वर्षों पश्चात होश आया की यह उसकी जमीन है। कोई जमीन हथिया रहा है तो उस समय या एक दो महीने या कुछ वर्षों पश्चात भी विरोध किया जा सकता था। मगर 40 वर्षों उपरांत विरोध करना यहाँ षड़यंत्र की बु आ रही है। और इस कार्य में प्रशासन को इन्वॉल्व ना करना मामले को और ही संदेहास्पद बना देता है।


उक्त भुमि पर 40 वर्षों से काबिज लोगों को तो बालको प्रबंधन द्वारा बकायदा शॉपिंग काम्प्लेक्स बनवाकर दिया जाना चाहिए। जिससे की उनकी रोजी रोटी प्रभावित ना हो। मूलनिवासी संघ नें आगे कहा की बालको प्रबंधन दूर के गांव को गोद ले रहा है यह कहकर की हम इनका कल्याण करेंगे और बालको की गोद में बसे हुवे गुमटी संचालको के साथ सौतेला व्यवहार कर रहा है। इसका अर्थ उसके द्वारा समाज सेवा का जो कार्य किया जा रहा है वह महज एक दिखावा है।

यहाँ गुमटीयों को तोड़ने की जगह खाली करने की नोटिस देना मगर उनके पुर्नवास के बारे में चिंतन ना करना यह बालको प्रबंधन के स्वार्थी रवइये को दर्शाता है। इससे समाज में अशांति फैलेगी। बालको प्रबंधन अगर सचमुच समाज हित में कार्य करना चाहता है तो जो गुमटीयां संचालित हैं उन्हें व्यवस्थित करते हुवे शॉपिंग काम्प्लेक्स खोलकर देना चाहिए। इससे बालको निवासियों का ही भला होगा। आखिरकार उन गुमटीयों में या तो सैलून दुकान है या फोटोकॉपी या डेली निड्स या साइकिल रिपेयरिंग या बाइक रिपेयरिंग या कार रिपेयरिंग या आम नागरिक की आम जरूरतों को पूरा करने वाले दुकान ही तो गुमटीयों में संचालित हैं।


इन दुकानों से या तो बालको के कर्मचारी लाभान्वित हो रहे हैं या हॉस्टल के बच्चे। अगर हॉस्टल के सामने स्थित गुमटीयों को वहाँ से हटा दिया जायेगा तो हॉस्टल के बच्चों के पास स्कूटी या बाइक इत्यादि साधन तो नहीं जिससे की वह दूर जाकर डेली जरूरत के समान खरीद पाएंगे। हॉस्टल के सामने गुमटीयो में सैलून, ब्रेड, चाय-नास्ता, फोटोकॉपी इत्यादि जरुरी दुकानें हैं जिससे बच्चों की डेली निड्स की चीजें मिलती हैं। अगर वहाँ से इन गुमटीयों को हटा दिया गया तो बच्चों को दूर जाना पड़ेगा छोटे मोटे समान खरीदने के लिए।


यहाँ हम देख सकते हैं की बालको प्रबंधन द्वारा स्वार्थी रवईया अपनाते हुवे बस तोड़फोड़ और उजाड़ने के बारे में ही सोचा जा रहा है। यहाँ मानवता को दरकिनार किया जा रहा है। आम जन मानस को गुमटीयों से होने वाले लाभ व व्यावसायियों के जीवन के बारे में ना सोचना यह प्रबंधन की अमानवीय शोषणकारी सोच को दर्शाता है। जिसका मूलनिवासी संघ कड़े शब्दों में विरोध प्रगट करता है।


इस तरह की नोटिस से संबंधित गुमटी संचालको व उनके परिवारों को मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड रही है। मूलनिवासी संघ नें प्रशासनिक दखल कर निष्पक्ष जाँच की मांग की है जिससे यह पता चले की उक्त भुमि सरकारी है या बालको प्रबंधन की। आगे मूलनिवासी संघ द्वारा बालको प्रबंधन पर यह आरोप लगाया गया है की बालको प्रबंधन की बहुत सी जमीन विवादित है। जिन्हे बालको अपना कहता तो है मगर वह उसकी जमीन वास्तविकता में होती नहीं।


जिसका जीता जागता उदाहरण बाल्को की ठेका कंपनी G 9 अहलुवालिया कंपनी द्वारा जो 10 मंजिला इमारत बनाई जा रही है। वह जिस भुमि पर बन रहा है उसमे वन विभाग से अनुमति के बिना पेड़ो की अवैध कटाई करवाई जा रही है। वह जमीन भी सुनने में यहीं आ रहा है की वह सरकारी भुमि है जिसके दस्तावेज बालको प्रबंधन प्रस्तुत नहीं कर पा रहा है। इस तरह से देखा जाये तो बालको अवैध पेड़ कटाई कर रहा है दूसरा सरकारी जमीन पर बिना किसी अनुमति के कब्जा करके 10 मंजिला इमारत खड़ा कर रहा है और दूसरी और 40 वर्षों से काबिज गुमटी संचालको को खुद सरकारी प्रशासन बनकर बेदखल करने की नोटिस जारी कर रहा है। महोदय यह जाँच का विषय है की जिस भुमि पर गुमटीयां संचालित हैं वह बालको प्रबंधन की भुमि है या वह भुमि सरकारी है। और उससे भी पहले बालको की ठेका कंपनी G9 अहलुवालिया द्वारा जो निर्माण कार्य करवाया जा रहा उक्त भुमि की जाँच होनी चाहिए की वह सरकारी भुमि है या बालको प्रबंधन की।



मूलनिवासी संघ नें जिलाधीश को दिए पत्र में यह स्पष्ट कहा है की अगर 15 दिवस के भीतर मामला की निष्पक्ष जाँच कर निपटारा नहीं किया जाता तो समस्त पीड़ित गुमटी व्यवसायीयों को उनके परिवार संहित बालको प्रबंधन एवं प्रशासन के खिलाफ चरण बद्ध आंदोलन किया जायेगा मानवाधिकार के संरक्षण व संवैधानिक लड़ाई के लिए कोर्ट भी जाना पड़े तो वह रास्ता भी अपनाया जायेगा।
उससे पहले एक मर्तबा संबंधित प्रबंधन को व प्रशासन को शांति वार्तालाप के माध्यम से मामले का निपटारा करना की अपील कर रहे हैं। कलेक्टर को दिए पत्र की प्रतिलिपि माननीय प्रधानमंत्री भारत सरकार, माननीय राष्ट्रपति भारत सरकार, माननीय मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन, माननीय राज्यपाल छत्तीसगढ़ शासन, मानवाधिकार आयोग छत्तीसगढ़ शासन, माननीय जिलाधीश महोदय कोरबा, श्रम आयुक्त / श्रम पदाधिकारी कोरबा, आयुक्त नगर निगम कोरबा, एस.डी.एम. कोरबा, थाना प्रभारी बाल्को, बाल्को टाउनशिप प्रबंधन, अध्यक्ष /सचिव चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स बालको को दिया गया है।
Uday Kumar serves as the Editor of Nawa Chhattisgarh, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering local, regional, and national developments.

