SECL दीपका क्षेत्र द्वारा अधिग्रहित ग्राम मलगांव के भू-विस्थापितों नें कोरबा जिला कलेक्टर महोदय को जन सुनवाई के दौरान ज्ञापन सौम्पा
मलगांव के मूलनिवासी भू-विस्थापितों नें SECL की आर एन्ड आर पॉलिसी का बहिष्कार करते हुवे कोल् बियरिंग एक्ट 1957 के तहत रोजगार, पुनर्वास एवं मुआवजा दिलवाये जाने की मांग किए।

ग्रामीणों नें SECL से लिखित जवाब तलब किया था। SECL दीपका क्षेत्र द्वारा उसका जो जवाब मिला वह प्रबंधन की दोहरी नीति को दर्शाता है। जवाब से यह स्पष्ट हो रहा है की SECL प्रबंधन भुमि अधिग्रहण के वक़्त जो वायदे मूलनिवासियों से करता है। वह महज ठगने के मकसद से कहता है।
SECL का मूल उद्देश्य किसी भी तरह से ग्रामीणों की जमीने हथियाना है। तदूपरान्त ग्रामीण दर बदर की ठोकरें खाता रह जाता है। मगर SECL के कानो में जूँ तक नहीं रेंगति। मानवता और संवैधानिक अधिकारों का हनन करता हुआ SECL प्रबंधन ज्यादा से ज्यादा कोयला उत्खनन के लालच में सारे नियम क़ानून ताक पर रख दिया है।
आखिरकार मूलनिवासियों की जमीने बिना किसी वाजिब मुआवजा, बिना रोजगार बिना पुनर्वास के छीनना इसमें मूलनिवासीयों का तो सीधा सीधा विनाश होता नजर आ रहा है।
किसी व्यक्ति के सर से छत छीनना फिर बदले में उसकी भरपाई ना करना। भुमि अधिग्रहण करना मगर बाद में हक अधिकार मारकर मूलनिवासियों को ठग देना। अब SECL के काले कारनामें लोगों से छिपे नहीं रहे। मूलनिवासीयों को अब यह ज्ञात हो चला है की SECL भुमि अधिग्रहण केवल कोयला उत्खनन के लिए करता है।
भू-विस्थापितों को बसाहट देने के लिए SECL भुमि अधिग्रहण करता ही नहीं तो बदले में बसाहट हेतु भुमि आवंटित करेगा कहाँ से, इसलिए तो भुमि अधिग्रहण उपरांत आर एन्ड आर पॉलिसी (SECL द्वारा निर्मित स्व कल्याण और मूलनिवासियों को प्रत्यक्ष रूप से हानि पहुंचाने वाले शोषणकारी अमानवीय असंवैधानिक नियम ) को आगे करके लोगों को नियम के नाम पर ठगता है।

Secl से प्राप्त इस लेटर में आप साफ साफ देख सकते हैं की किस तरह से SECL बारम्बार उक्त पत्र में नियमानुसार शब्द का उपयोग किया है। मगर वह लिखित में यह स्पष्ट नहीं लिख रहा की SECL द्वारा निर्मित आर एन्ड आर पॉलिसी के नियमानुसार, क्योंकि अगर वह ऐसा लिखेगा तो वह फ़स जायेगा। क्योंकि भारतीय संविधान में कोल् बियरिंग एक्ट 1957 में भू विस्थापितों के हित से जुड़े उनके रोजगार पुनर्वास एवं बसाहट से जुड़े तमाम संवैधानिक हक अधिकार स्पष्ट रूप से वर्णित हैं।
अगर मूलनिवासियों को कोल् बियरिंग एक्ट के तहत हक अधिकार मिलने लगे तो इससे मूलनिवासियों का विकास होने लगेगा। जो शोषण कारी मानसिकता वालों के गले की हड्डी बन जायेगा। ताकि मूलनिवासी समाज का विकास ना हो इस उद्देश्य के साथ मूलनिवासीयों की जमीन देश के विकास के नाम पर बंदूक की नोक पर छिनी जा रही हैं। और उन्हें उनके ही जमीन से बेदखल कर दिया जा रहा है।
नाम मात्र का किसी किसी को कुछ मुआवजा थमा दिया जा रहा है। और एग्रीमेंट में जबरन का हस्ताक्षर लेकर उन्हें वहाँ से डरा धमका कर भगा दिया जा रहा है। मलगांव वासियों का आरोप है की जो कोई ग्रामीण हक अधिकार के लिए आवाज उठाता था। पुलिस प्रशासन उसे कोयला चोरी में फ़साने की धमकी देकर उसके आवाज को दबा देती थी।

कोई SECL कर्मचारी अपने हक अधिकार की मांग करता तो नौकरी से बैठा दिया जाता या ट्रांसफर करवा दिया जाता। ऐसे कई SECL कर्मचारी हैं। जिनका मुआवजा बनने उपरांत उनका मुआवजा काटा गया और बाहरी धन्ना सेट लोगों को जो गांव के मूलनिवासी नहीं उनका करोडो करोडो का मुआवजा प्रशासनिक अधिकारीयों की सांठ गांठ में बनाया गया।
SECL में जो PAPS के तहत भू-विस्थापितो के लिए ठेका का कोटा सुरक्षित है। उसमे भी धांधली करके वह कोटा शून्य कर दिया गया है। अब केवल अधिकारीयों के चहेते ठेकेदारों को ही ठेका मिलता है। मूलनिवासियों के लिए संरक्षित 30% ठेका भी SECL के अधिकारीयों के चहेते बाहरी गैर भू विस्थापित ठेकेदार लेते हैं। इस तरह से हर एंगल से भू विस्थापितों के अधिकारों का हनन हो रहा है।
रही बात रोजगार की तो मलगांव के पीड़ित शोषित भू-विस्थापितों नें SECL पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना हैं की SECL का ऑलरेडी 80% प्राईवेटाइजेशन हो चूका है। क्योंकि SECL का 80% काम अब प्राइवेट ठेका कंपनियां संभाल रही हैं। अब SECL में महज 20% ही सरकारी रोजगार बचे हैं जिसमे ऑलरेडी पहले से रोजगार कर रहे हैं।
रही बात SECL के अंतर्गत जो ठेका कंपनियां हैं उसमे रोजगार के अवसर की तो सीधी सी बात है की SECL नें इसके लिए एक कमेटी घठित कर रखी है। जिसके मेंबर तथाकथित राजनैतिक पदों पर आशिन लोग हैं। जिनके माध्यम से ठेका कंपनियों में रोजगार हेतु नियुक्ति होती है। अब जाहिर सी बात है वहाँ जो पैसे देगा उन्हें एंट्री मिलेगी जो नहीं देगा उसे एंट्री नहीं मिलेगी। बस यही तो हो रहा है।
मूलनिवासी भू विस्थापित ऑलरेडी अपनी जमीने अपना घर देश हित में लुटा चूका जिसके बदले सरकारी भी नहीं बल्कि ठेका कंपनियों में प्राइवेट रोजगार दिए जाने हेतु कमिटमेंट किया गया था मगर भुमि अधिग्रहण उपरांत SECL साफ साफ लिखित दे रहा है की कमेटी द्वारा चयनित व्यक्ति ठेका कंपनियों में काम करेगा।

इस तरह से रोजगार के नाम पर भी मूलनिवासीयों को लम्बे समय से ठगा जा रहा है। पहले तो जमीन के बदले सरकारी रोजगार दिए जाते थे जैसे जैसे प्राइवेटाइ जेशन होता गया अब सरकारी की जगह ठेका कंपनियो में रोजगार दिए जाने का प्रलोभन दिया जाने लगा और यह ठेका कंपनीयां भी कोई जिंदगी भर की नौकरी नहीं देने वाली इनका तो खुदका पांच वर्षो का टेंडर होता हैं। उसके बाद अगला टेंडर इन्हे खुद मिलेगा की नहीं मिलेगा यह भी उन्हें पता नहीं।

अगर बात करें बसाहट की तो मलगांव के मूलनिवासीयों का वोटर लिस्ट उठाकर ग्राम झाबर में शामिल कर दिया गया है। यहाँ तक की ग्राम झाबर के सरपंच को ग्राम मलगांव का सरपंच घोषित कर दिया गया है। मगर SECL प्रबंधन द्वारा मलगांव वासियों को बसाहट अब तक नहीं दिया गया है। जब की भुमि अधिग्रहण पूर्व मलगांव वासियों से यह वायदा किया गया था की बालिग़ बेटियों को भी बसाहट में पात्रता दी जाएगी। और तो और जो बसाहट नहीं लेना चाहते उन्हें बसाहट के एवज में 15-15 लाख दिए जायेंगे। मगर भुमि अधिग्रहण उपरांत आज दिनांक तक मलगांव वासियों को बसाहट हेतु ना तो भुमि आवंटित किया गया और ना ही बसाहट के एवज में 15 – 15 लाख मुआवजा राशी सबको दिया गया। बालिग़ बेटियों को भी किए गए वायदे से SECL मुकरता नजर आ रहा है।
Uday Kumar serves as the Editor of Nawa Chhattisgarh, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering local, regional, and national developments.

