कोरबा, छत्तीसगढ़। – एस.ई.सी.एल. (SECL) की *दीपका ओपन कास्ट कोयला खदान* की वार्षिक उत्पादन क्षमता को मौजूदा *40 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) से बढ़ाकर 55 MTPA* करने का प्रस्ताव क्षेत्र के लिए गंभीर पर्यावरणीय, सामाजिक और मानवीय संकट को जन्म देने वाला है। यह प्रस्ताव न केवल पर्यावरणीय संतुलन को गहराई से प्रभावित करेगा, बल्कि स्थानीय निवासियों के *स्वास्थ्य, जल-संसाधनों, कृषि, आजीविका और सुरक्षा* पर भी विनाशकारी प्रभाव डालेगा।
इस संदर्भ में *साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL)* की परियोजना को लेकर *केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC)* की टीम के प्रस्तावित निरीक्षण को कोरबा क्षेत्र के नागरिक, किसान, आदिवासी समुदाय और पर्यावरण कार्यकर्ता अत्यंत गंभीरता से देख रहे हैं। हम स्पष्ट रूप से कहना चाहते हैं कि केवल कागज़ी रिपोर्टों और औपचारिक प्रस्तुतियों के आधार पर लिया गया कोई भी निर्णय *ज़मीनी हकीकत से आँख मूँदने जैसा होगा*।
जब मौजूदा 40 MTPA उत्पादन ने ही दीपका–कोरबा क्षेत्र को प्रदूषण, जल संकट और सामाजिक असुरक्षा की स्थिति में पहुँचा दिया है, तब 55 MTPA का विस्तार किस आधार पर न्यायसंगत ठहराया जा सकता है?
*वायु और ध्वनि प्रदूषण*
कोयले की महीन धूल, राख और लगातार बढ़ती ब्लास्टिंग गतिविधियों ने पूरे क्षेत्र की हवा को विषैला बना दिया है।
* श्वसन रोग, दमा, आँखों और त्वचा से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं।
* भारी ब्लास्टिंग से ज़मीन में कंपन होता है, जिससे घरों में दरारें पड़ रही हैं।
* निरंतर शोर और भय के माहौल का असर लोगों के *मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन* पर भी पड़ रहा है।
अत्यधिक खनन के कारण भूजल स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका है।
* खदान का दूषित पानी नदी-नालों में मिलकर कृषि भूमि को बंजर बना रहा है।
* किसान सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।
*पर्यावरण और जैव विविधता पर सीधा हमला*
विस्तार के नाम पर हो रही अंधाधुंध वृक्ष कटाई ने पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर दिया है।
पेड़ों की कटाई से *आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा और आजीविका* पर सीधा हमला किया है।
इस परियोजना की सबसे गंभीर और चिंताजनक खामी यह है कि *ड्रेनेज एरिया* और विशेष रूप से *लीलागर नदी* पर पड़ने वाले प्रभावों का आज तक कोई समग्र, वैज्ञानिक और पारदर्शी अध्ययन नहीं किया गया।
* पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) प्रक्रिया में नदी, उसके बाढ़ क्षेत्र और प्राकृतिक जल प्रवाह को लगातार नजरअंदाज किया गया है।
* पूर्व में भारी वर्षा के दौरान लीलागर नदी का प्रवाह बदलकर सीधे खदान की ओर चला गया, जिससे पूरा खदान जलमग्न हो गया और कई दिनों तक उत्पादन पूरी तरह बाधित रहा।
* यह घटना एक *स्पष्ट चेतावनी* थी, लेकिन उससे सबक लेने के बजाय अब और बड़े विस्तार की तैयारी की जा रही है।
यह स्थिति EIA प्रक्रिया की *विश्वसनीयता और निष्पक्षता* पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
दीपका क्षेत्र में कोयले का सड़क मार्ग से परिवहन पहले से ही असहनीय स्तर पर पहुँच चुका है।
* जर्जर सड़कों से उड़ती कोल डस्ट और रोड डस्ट ने वायु प्रदूषण को चरम पर पहुँचा दिया है।
* *सिरकी खुर्द* सहित कई गाँवों के लोगों को बार-बार आंदोलन करना पड़ा, फिर भी आज तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
* कंपनी द्वारा लगाए गए फिक्स्ड वॉटर स्प्रिंकलर वर्षों से केवल दिखा वे तक सीमित हैं; उनका रखरखाव लगभग शून्य ही रहता है।
वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत वर्ष 2014 में जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार खनन परियोजनाओं में *सेफ्टी ज़ोन का निर्माण अनिवार्य* है।
* दीपका परियोजना में अब तक सेफ्टी ज़ोन का निर्माण नहीं किया गया है।
* यह सीधे-सीधे पर्यावरणीय शर्तों और वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
साइलो को आधुनिक और “क्लीन सिस्टम” बताकर प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है।साइलो से तेज़ गति में कोयला गिरने के दौरान सूक्ष्म कण (Fine Particles) हवा में फैलते हैं।
बेल्ट कन्वेयर और लोडिंग सिस्टम से उत्पन्न लगातार शोर आसपास के गाँवों के लिए मानसिक तनाव का कारण बन रहा है।
सीएचपी किसी भी दीपका ओपन कास्ट खदान का सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाला हिस्सा है। क्रशिंग, स्क्रीनिंग और कन्वेयर सिस्टम से निकलने वाली अत्यंत महीन कोयला धूल फेफड़ों के लिए सबसे खतरनाक होती है। सीएचपी से निकलने वाला अपशिष्ट जल आसपास के नालों में मिलकर जल प्रदूषण बढ़ाता है।
24×7 संचालन के कारण दिन-रात शोर और कंपन बना रहता है, जिससे सामान्य जीवन असंभव हो जाता है। सीएचपी के आसपास रहने वाले लोगों में टीबी, अस्थमा और क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस के मामले बढ़ रहे हैं।
कोयला परिवहन में लगे सैकड़ों भारी वाहनों का पार्किंग यार्ड एक चलता-फिरता प्रदूषण स्रोत बन चुका है।
खड़े ट्रकों से उड़ती रोड डस्ट और कोल डस्ट वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
डीज़ल धुएँ और इंजन की आवाज़ से स्थानीय वातावरण विषैला हो रहा है।
पार्किंग यार्ड के कारण सामाजिक असुरक्षा, दुर्घटनाएँ और सड़क जाम की समस्याएँ बढ़ रही हैं।
55 MTPA विस्तार के साथ हैवी ब्लास्टिंग की तीव्रता और आवृत्ति कई गुना बढ़ेगी, जिसके परिणाम विनाशकारी होंगे
ज़मीन में तेज़ कंपन से घरों में गहरी दरारें, दीवार गिरने और संरचनात्मक क्षति का खतरा।
ब्लास्टिंग से उड़ने वाले पत्थर (Fly Rock) से जान-माल की सीधी हानि की आशंका।
ब्लास्टिंग के कारण भूजल प्रवाह बदलता है, जिससे कुएँ और हैंडपंप सूख रहे हैं।
विस्फोट की आवाज़ से बच्चों और बुजुर्गों में मानसिक भय, अनिद्रा और तनाव बढ़ रहा है।
दीपका ओपन कास्ट माइन के भीतर कोयले का अव्यवस्थित, खुले में और अनियंत्रित भंडारण एक गंभीर पर्यावरणीय व स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। खदान परिसर में बड़े-बड़े कोयला ढेर (Coal Stock/Heap) बिना किसी वैज्ञानिक प्रबंधन, कवरिंग या धूल-नियंत्रण उपायों के रखे गए हैं, जिससे आसपास के क्षेत्र पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
खुले कोयला ढेरों से लगातार फाइन कोल डस्ट (PM10/PM2.5) उड़ती रहती है, जो हवा के साथ खदान के बाहर के गाँवों तक पहुँचती है। यह प्रदूषण अस्थायी नहीं बल्कि 24×7 स्थायी प्रकृति का है। जिससे कई सारी सांस संबंधी बीमार का ख़तरा रहता है।
अव्यवस्थित और लंबे समय तक पड़े कोयला ढेरों में स्वतः आग लगने की घटनाओं का जोखिम बना रहता है। ऐसी आग से विषैली गैसें (CO, SO₂, NOx) निकलती हैं, जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए अत्यंत घातक हैं।
खदान में काम करने वाले श्रमिकों को अत्यधिक धूल, गर्मी और जहरीली हवा में काम करना पड़ता है, जो श्रम सुरक्षा मानकों का उल्लंघन है।
रेलवे साइडिंग, साइलो, सीएचपी, पार्किंग यार्ड और हैवी ब्लास्टिंग—ये सभी मिलकर दीपका क्षेत्र को एक उच्च-जोखिम औद्योगिक ज़ोन में बदल चुके हैं।
इनके संयुक्त प्रभाव का आकलन किए बिना 55 MTPA विस्तार की अनुमति देना,पर्यावरण संरक्षण कानूनों की भावना के विरुद्ध हऔरस्थानीय समाज के जीवन के अधिकार (Right to Life) का उल्लंघन
और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से खिलवाड़ होगा।
सबसे पहले पूर्व की मांगो पर तत्काल कार्यवाही आवश्यक है
पहले मौजूदा 40 MTPA खदान का *स्वतंत्र, निष्पक्ष सामाजिक एवं पर्यावरणीय ऑडिट* कराया जाए।
ड्रेनेज एरिया और लीलागर नदी पर प्रभाव का *वैज्ञानिक, पारदर्शी अध्ययन* अनिवार्य किया जाए।
प्रभावित ग्राम सभाओं की वास्तविक और सूचित सहमति* के बिना कोई निर्णय न लिया जाए।
लंबित रोजगार, मुआवजा, पुनर्वास, सेफ्टी ज़ोन और परिवहन सुधार को प्राथमिकता के साथ लागू किया जाए, उसके बाद ही किसी विस्तार पर विचार हो।
पूर्व में कई बार पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को लिखित शिकायत किया जा चुका है इसके बावजूद स्थिति नहीं सुधरी है। इस स्थिति में 55 MTP को मंजूरी देना गंभीर प्रश्नचिन्ह है।
यदि यह विस्तार स्थानीय लोगों की सहमति, पर्यावरणीय अनुपालन और वैज्ञानिक तथ्यों की अनदेखी कर आगे बढ़ाया गया, तो यह निर्णय कोरबा जिला को पर्यावरणीय और सामाजिक आपदा की ओर धकेलने वाला कदम होगा।

Uday Kumar serves as the Editor of Nawa Chhattisgarh, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering local, regional, and national developments.

