मेरा नाम उदय कुमार (उदय चौधरी) है। मैं छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के दीपका का निवासी हूँ। एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते मैंने हमेशा समाज और जनहित के मुद्दों को उठाया है। लेकिन विडंबना यह है कि जो व्यक्ति समाज के लिए न्याय की लड़ाई लड़ता रहा, उसे आज अपने ही घर में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
मेरे पिता स्वर्गीय रामपति ने अपने जीवनभर की मेहनत से परिवार के लिए संपत्ति बनाई थी। उनका सपना था कि उनके जाने के बाद परिवार के सभी सदस्य मिल-जुलकर रहें और सभी को उनका वैधानिक अधिकार मिले। लेकिन पिता के निधन के बाद परिस्थितियाँ बदलती चली गईं।मेरे पिता ने कटघोरा रोड पर लगभग 11 डिसमिल भूमि खरीदी थी।
उसमें से कुछ भूमि बेची गई और शेष भूमि परिवार की महत्वपूर्ण संपत्ति थी। मेरे संज्ञान में आया कि मेरे मंझले भाई सुधीर चौधरी और मेरी माता ने उस भूमि को उसकी वास्तविक कीमत से बहुत कम मूल्य पर बेच दिया। मुझे यह भी संदेह हुआ कि वास्तविक विक्रय राशि परिवार के सामने बताई गई राशि से कहीं अधिक थी, लेकिन उसका कोई स्पष्ट हिसाब-किताब कभी नहीं दिया गया।बाद में मुझे जानकारी मिली कि विक्रय की राशि मेरी माता के बैंक खाते में आई और उसके बाद खाते से ऑनलाइन लेन-देन हुए।
मुझे आज तक यह नहीं बताया गया कि वह पैसा कहाँ गया और उसका उपयोग किस प्रकार हुआ। मुझे और मेरे बड़े भाई अजय चौधरी को उस धनराशि का कोई लाभ नहीं मिला।जब मैंने अपने हिस्से और पैसों का हिसाब माँगा, तभी से मेरे जीवन में संघर्ष शुरू हो गया। विवाद बढ़ा और मेरे विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज कराए गए।
मुझे जेल भी जाना पड़ा। लेकिन अंततः न्यायालय ने मुझे सम्मानपूर्वक दोषमुक्त (बाइज्जत बरी) किया। इससे मुझे विश्वास हुआ कि सत्य देर से सही, सामने अवश्य आता है।इसी दौरान मेरे बड़े भाई अजय चौधरी को भी परिस्थितियों के कारण अपना घर छोड़ना पड़ा। बाद में मेरे, मेरी पत्नी और बच्चों के विरुद्ध भी शिकायतें और आपराधिक मामले दर्ज कराए गए। मुझे लगता रहा कि मुझे मानसिक और कानूनी रूप से कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।
मेरे जीवन का सबसे बड़ा झटका तब लगा जब मैं लगभग डेढ़ महीने तक सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों के लिए बाहर था। मेरी अनुपस्थिति में पैतृक संपत्ति का फर्द बंटवारा करा दिया गया। जब मैंने दस्तावेज देखे तो मेरे नाम के ऐसे हस्ताक्षर दिखाई दिए जिन्हें मैं अपना हस्ताक्षर नहीं मानता। मेरा मानना है कि यदि इन हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच कराई जाए तो सच्चाई सामने आ सकती है।बंटवारे में मेरे हिस्से की भूमि ऐसी जगह दर्शाई गई जहाँ उचित रास्ता तक उपलब्ध नहीं था।
इससे भी अधिक दुखद यह है कि जो भूमि मेरे हिस्से में दिखाई गई, उस पर भी आज तक मेरा वास्तविक कब्जा नहीं है। उस पर मेरी माता और मेरे मंझले भाई का कब्जा है। उसी भूमि पर बने मकानों से किराया भी लिया जा रहा है, लेकिन मुझे उसका कोई हिस्सा या हिसाब नहीं दिया जाता।मेरे पिता ने परिवार की सुविधा के लिए बोरवेल खुदवाया था और नगर पालिका से जल कनेक्शन भी लिया था।
बाद में मेरे बड़े भाई ने भी एक अलग बोरवेल बनवाया। मेरे अनुभव में मुझे और मेरे परिवार को इन मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित किया गया, जिसके कारण हमें नया जल कनेक्शन लेना पड़ा।समय के साथ मुझे यह भी जानकारी मिली कि मेरी माता से पावर ऑफ अटॉर्नी और वसीयत जैसे दस्तावेज भी तैयार कराए गए। यदि वे स्वतंत्र इच्छा से नहीं बनाए गए हैं या उनमें किसी प्रकार का अनुचित प्रभाव रहा है, तो उनकी वैधता का निर्णय न्यायालय ही करेगा।आज स्थिति यह है कि मैं अपनी ही पैतृक संपत्ति में अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा हूँ।
जब भी मैं अपने हिस्से की बात करता हूँ, विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कई घटनाओं के वीडियो और अन्य साक्ष्य मेरे पास सुरक्षित हैं।मेरी पत्नी को भी इस संघर्ष की भारी कीमत चुकानी पड़ी। उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया, उन्हें “टोन्ही” कहकर संबोधित किया गया और हमारे पूरे परिवार को मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा। मेरे बच्चों ने भी इस तनावपूर्ण वातावरण का असर झेला है।
एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के कारण मैं सार्वजनिक हित के मुद्दे उठाता रहा हूँ। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जब-जब मैंने भ्रष्टाचार और जनहित के विषय उठाए, तब-तब मेरे और मेरे परिवार के विरुद्ध विवाद और शिकायतें बढ़ीं। यही कारण है कि मैंने न्यायालय और कानून का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया।आज मेरी केवल एक ही मांग है—सत्य की निष्पक्ष जांच हो। यदि किसी ने कोई गलत कार्य नहीं किया है, तो उसे जांच से डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
और यदि किसी ने कानून का उल्लंघन किया है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।मैं यह लड़ाई किसी से बदला लेने के लिए नहीं लड़ रहा हूँ, बल्कि अपने वैधानिक अधिकारों, अपने परिवार के भविष्य और न्याय की स्थापना के लिए लड़ रहा हूँ। मुझे भारतीय न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है कि एक दिन सत्य अवश्य सामने आएगा और मुझे मेरा अधिकार मिलेगा।— उदय कुमार (उदय चौधरी)एक सामाजिक कार्यकर्ता, जो आज अपने ही अधिकारों के लिए न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।
Uday Kumar serves as the Editor of Nawa Chhattisgarh, a Hindi-language news outlet. He is credited as the author of articles covering local, regional, and national developments.

